চন্দ্রমুখী ষোলকলা

রক্তিম
চন্দ্রমুখী ষোলকলা
- (রক্তিম)
তোকে কত বারণ করেছি কথা রাখিস নি
তুই এখন বড় হয়েছিস চন্দ্রমুখী ষোলকলায়;
বুকের ভিতর মেঘের গুরগুর ডাক...
হঠাৎ আবিষ্কার শিরদাঁড়ায় যেন পাহাড়ি ঝর্ণা।
এখনি খানা খন্দর নুড়ি পাথর সব ভাঙবে।
যখন তখন পড়ার ঘরে কেন আসিস?
আমার উড়ুউড়ু মনে মেঘের আনাগোনা।
কিছুতেই স্বস্তি পাইনা;কেমন যেন মনে হয়
প্রতিবেশী চোরা নজর অষ্টপ্রহর দেয় প্রহরা।
নিজেকে ভীষণ রকম অপরাধী মনে হয়।
এবারে প্রথম বরষায় ছাদে ভিজবার আমন্ত্রন
ইচ্ছাসত্ত্বেও ফিরিয়েছি, অভিমানী চোখে বৃষ্টি দেখেছি।
বাজ পড়লেই যে ভয়ে জড়িয়ে ধরিস
যেমন মাধবীলতা জড়িয়ে বেঁচে থাকে।
তোর সবুজ অবুঝ মন, নীল সবটা বোঝে।
সামনের মাসে ব্যঙ্গালুরু চলে যাব চাকরীতে।
ভোরবেলা আর ডাকিস'না ফুল কুড়াবার ছলে;
আমি এখন রসালো আমগাছ হতে চলেছি
আর কিছুদিন অপেক্ষায় থাকিস কুমু;
তোর নীল'দা ঠিক আসবে কনে দেখা রোদ্দুরে।



ASIT KUMAR ROY 5 দিন 10 ঘন্টা আগে
তোমার বাঁশি অন্তরেতে বাজে
হাজার কাজের মাঝে মাঝে।
কতদিন কত বর্ষা বাদল রাতে
আগুন ঝরা নিত্য সকাল-সাঁঝে।
জীবন গানের ছন্দের তালে তালে
যেন বাঁশির সুরের দোলনা দোলে।।
যেই গানেতে প্রাণের প্রদীপ দাও জ্বেলে
সেগান জাগে উজান ঠেলে পাল তুলে ।
যায় বললেই চলে যাওয়া যায় নাকি!
রাত্রি শেষের পথ এখনো যে আছে বাকি।
মধুর হাসি বাঁশির সুরে সুরে
তুফান তোলে সবার হৃদয়পুরে।
বাশিওয়ালা আবার বাঁশি বাজাও
ভুবন ডাঙার উদাস দুপুর জাগাও।
আগামীর সুরে জাগাও।
ASIT KUMAR ROY 4 দিন 10 ঘন্টা আগে
মাঠ ভরা ফসলে পতঙ্গ ছেড়ে দিচ্ছে
আমি প্রতিবাদ করছিনা।
আমার তিল তিল করে বোনা
স্বপ্নবৃক্ষের শাখা ভেঙে মুচড়ে দিচ্ছে।
আমি শুধু নিরবে দেখছি, কিচ্ছু বলছিনা।
দুষ্কৃতীরা মেয়েটাকে অন্ধকারে নিয়ে গেল
আমি শুধু চেয়ে চেয়ে দেখলাম।
একবার ও চিৎকার করলাম না।
ছেলেটা সৎ প্রচেষ্টায় জানলা খুলতে চায়ছে
যেন সূর্য চন্দ্রের আলো তাঁর মুখে পড়ে।
একে একে যত আলো আছে
জানিনা কোন নিষ্ঠুর ষড়যন্ত্রে
সবটা নিভিয়ে দেবার চেষ্টা চলছে।
জনজীবন ক্রমশ অচল হয়ে উঠছে।
দ্রোহ পোকারা শরীরে অন্তরে ছড়িয়ে পড়ছে,
তবু ও কেমন করে জানি সব মেনে নিচ্ছি।
নিরবে অদ্ভুত আয়োজনে নির্লিপ্ত থাকি।
যদি ও আমি নিজেকে ভালই চিনি
নির্ভীক এবং সাহসী।
তবুও কেন আগ্নেয়গিরির মত
অগ্ন্যুৎপাত ঘটাতে পারছিনা।
অপেক্ষা করছি সঠিক সময়ের
কিন্ত আর কতদিন।
আর কতদিন।
অন্যায় যে ধিরে ধিরে মাথা চাড়া দিচ্ছে
উঁচু পাহাড়ের মত নিঃশ্বাস বন্ধ হয়ে আসছে।
কবে! কবে আমি আগুন হয়ে জ্বলব!
কবে! কবে আমি সুনামি হয়ে উঠব!
আমার আত্মার আর্ত চিৎকার কেউ শুনবে।
ASIT KUMAR ROY 3 দিন 11 ঘন্টা আগে
স্বপ্ন-সকাল আজো আসেনি ধুসর মেঘের পাহাড়
খাল কেটে কুমির এলো, দিলো হিংসা ভরা আধার।
কথা দিয়েও আসলেনা কেন আমায় ভালবাসলেনা
নিরব ব্যথা পৃথিবী জানে শুধু তুমিই জানলেনা।
জীবনের যত যন্ত্রনা সবটুকু সয়ে যেতে পারি প্রিয়
শুধু একবার পথে যেতে যেতে যদি ফিরে তাকাও।
তুমি সেই দাঁড়িয়ে আছ হৃদয়ের প্রান্তিক সীমানায়
হয়তো বৃষ্টি ভেজা প্রাতে নয়তো নরম শিশির মেশায়।
জন জীবনে ছড়িয়ে পড়ুক আলো হাসি আর গান
নাগপাশ বন্ধন যাক টুটে মুক্তির স্বাদ করুক পান।
ASIT KUMAR ROY 2 দিন 12 ঘন্টা আগে
জীবনের আঁকিবুকি জলছবি জমিয়ে রাখী
তবু দেখি খাঁচা ভেঙ্গে উড়ে যায় পাখী।
নদীতে ছিন্ন-পাতার ভেলা ভাসাই বারে বারে
যতই ভুলতে চাই ততই তোমায় মনে পড়ে।
ক্রমশ রাত গভীর চাদের চোখে ঘুম আসে
দারুচিনি দ্বীপে আসর কথাকলির মেলা বসে।
ভয়কে চিরদিন শুধু জয় করতেই চেয়েছি
কচুরিপানার মত বাড়ে তবু লড়ে যাচ্ছি।
কান্না সরিয়ে সরিয়ে হাসি খুঁজে খুঁজে বেড়াই
গোলকধাধায় শুধুই ঘুরে ঘুরে পথ শ্রান্ত হই।
ASIT KUMAR ROY 1 দিন 11 ঘন্টা আগে
এক টুকরো ছোট্টবেলা যেন কুড়িয়ে পেলাম
গরম গরম জিলিপি জিভের স্বাদে খেলাম
ঘাড় নাড়া বূড়োর সাথে খানিক কথা হলো
ইচ্ছে মূর্তিখানি সেদিন কিনতে বাকি ছিল।
আজ হাতে পয়সা আছে হারিয়ে গেছে ইচ্ছে,
যার বায়নায় মন কাঁদত সেইতো নেই কাছে।
আসছে রথ যাচ্ছে রথ আলো ফুলে সাজে সেজে
মেলার ভিড়ে একলা আমি সাথী পাইনা খুঁজে।
সেই দুটি চোখ যতই খুঁজি আর পাব না জানি...
পাপড় ভাজায় পুড়ছে মন খুঁড়ছি স্মৃতির খনি।
এও কি হয়! সামনেই দেখি সেই বায়না মুখচ্ছবি
চেনা চোখের মেয়ের মা কিনছে মাটির গড়া রবি।
ASIT KUMAR ROY 23 ঘন্টা 15 মি আগে
मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बाते करते हैं
तुम होती तो कैसा होता तुम ये कहती तुम वो कहती
तुम इस बात पे हैरान होती तुम उस बात पे कितनी हँसती
तुम होती तो ऐसा होता तुम होती तो वैसा होता
मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बाते करते हैं
रूउ रूउ रूउ रूउ रूउ रूउरूउ रूउ
ये कहा आ गये हम यूँ ही साथ साथ चलते
तेरी बाहों में है जानम मेरे जिस्मोजां पिघलते
तेरी बाहों में है जानम मेरे जिस्मोजां पिघलते
ये कहा आ गये हम यूँ ही साथ साथ चलते
ये रात है या तुम्हारी ज़ूल्फेन खुली हुई हैं
है चाँदनी तुम्हारी नॅज़ारो से मेरी राते धूलि हुई हैं
ये चाँद है या तुम्हारा कंगन सितारे हैं या तुम्हारा आँचल
हवा का झोंका है या तुम्हारे बदन की खुशबुऊ
ये पट्टियों की है सरसराहट के तुमने चुपके से कुच्छ
कहा ये सोचता हूँ मैं काबसे गुमासूम
की जबकि मुझको भी ये खबर है
की तुम नहीं हो कहीं नहीं हो
मगर ये दिल है की कह रहा है..
तुम यहीं हो यहीं कहीं हो
तू बदन है मैं हूँ साया तू ना हो तो मैं कहा
हूँ मुझे प्यार करने वाले
तू जहा है मैं वहाँ हूँ हमें मिलना ही था
हमदम इसी राह पे निकलते हमें मिलना ही था
हमदम इसी राह पे निकलते ये कहा आ गये हम
यूँ ही साथ साथ चलते
मेरी साँस साँस महके कोई भीना भीना चंदन
तेरा प्यार चाँदनी है मेरा दिल है जैसे आँगन
कोई और भी मुलायम मेरी शाम ढलते ढलते
कोई और भी मुलायम मेरी मेरी शाम ढलते ढलते
ये कहा आ गये हम यूँ ही साथ साथ चलते
मजबुउर ये हालात इधर भी है उधर भी
तन्हाई के ये रात इधर भी है उधर भी
कहने को बहुत कुच्छ है मगर किससे कहें हम
कब तक यूँ ही खामोश रहे और सहें हम
दिल कहता है दुनिया की हर इक रस्म उठा दें
दीवार जो हम दोनो में है आज गिरा दें
क्यों दिल में सुलगते रहे लोगों को बता दें
हन हमको मुहब्बत है मोहब्बत है मोहब्बत है
अब दिल में यही बात इधर भी है उधर भी
ये कहा आ गये हम यूँ ही साथ साथ चलते
ये कहा आ गये हम ये कहा आ गये हम
ASIT KUMAR ROY 10 ঘন্টা 16 মি আগে
তুমি বুঝবে
যদি তুমি হও প্রকৃত উদার শব্দচাষি।
কিছুটা ধাঁধার মতো হয়তো মনে হবে।
উত্তর দিতেও পারো নাও দিতে পারো...
সে আমার সাথে দিব্যি রয়ে গেছে
বুঝতে পারি সে সাথেই আছে;
জানিনা এত ভালবাসার কি কারণ?
কিছুতেই সে আমায় ছেড়ে যায়না।
উঠতে বসতে বুঝিয়ে দেয় সে আছে
পরজীবীর মত নিরবে সরবে বাঁচে।
যেন তার আছে বিশেষ এক দিব্যশক্তি।
পাহারা দেয় দিনে রাতে সকাল সাঁঝে।
ডাক্তারবাবু নিদান দিয়েছেন
ও থাকবে গান আবৃত্তি গল্প আড্ডা খুনসুটিতে
এই আছি এই নেই কানামাছি খেলবে।
অন্তরাত্মা থরথর কম্পনে কাঁদাবে
চোখের কোণে জল এলে, আবার মুছিয়েও দেবে
নরম গরম উষ্ণতার ছোঁয়ায় বলবে
-খুব বুঝি কষ্ট দিয়েছি তোমায়।
তক্ষুনি সে প্রজাপতির মত ছোটবেলার স্মৃতি
কুড়িয়ে আনবে, দৌড় ঝাপ সাঁতারের কথাকলি।
কিছুক্ষনের জন্য সব ভুলে হেসে মেতে উঠি;
সত্যিইতো তখন সে বন্ধু সখা সহমর্মিতায়
হয়ে ওঠে আজীবনের সমব্যথী।
সুরে বেসুরে গেয়ে ওঠে চিরন্তনী গান
'' পুরানো সেই দিনের কথা''
আমার যত কপট রাগ অভিমান
কখন যেন অঝোরে বৃষ্টি হয়ে ঝরে গেছে...
আমাদের সেই আড্ডা দেওয়া ছাতিমতলায়
এখন ফেলে আসা কত চেনা মুখের ভিড়।
নতুন মন্তব্য পাঠান